स्कूल में ‘भूत’ का डर: पढ़ाई छोड़ मंदिर बना, बच्चों से वसूले गए पैसे—अब जांच शुरू
कौसानी के सरकारी स्कूल में 30 साल पुरानी कहानी बनी ‘हकीकत’, बच्चों के डर को दूर करने के लिए बना दिया गया ‘भूत मंदिर’
एक तरफ दुनिया अंतरिक्ष और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नई ऊंचाइयों को छू रही है, वहीं उत्तराखंड के पहाड़ों में आज भी अंधविश्वास की जड़ें गहरी हैं। ताजा मामला कौसानी के राजकीय इंटर कॉलेज का है, जहां ‘विज्ञान’ नहीं, ‘भूत’ चर्चा का विषय बन गया है।
यहां स्कूल परिसर के भीतर करीब 20 ईंटों से एक छोटा सा ‘भूत मंदिर’ बना दिया गया। दावा किया गया कि इससे एक ‘भटकती आत्मा’ को शांति मिलेगी और बच्चों का डर खत्म होगा।
30 साल पुरानी मौत, अब बना डर का आधार
पूरी कहानी की शुरुआत करीब 30 साल पहले हुई, जब स्कूल के पास एक नेपाली युवक की फिसलकर मौत हो गई थी। समय के साथ यह घटना अफवाहों में बदल गई—लोगों ने कहना शुरू किया कि उसकी आत्मा आज भी यहां भटकती है।
धीरे-धीरे इस स्थान पर अजीब गतिविधियां शुरू हो गईं—पान-सुपारी चढ़ाना, फिर शराब की बोतलें, कपड़े और यहां तक कि जानवरों की बलि भी दी जाने लगी। सुबह स्कूल आने वाले बच्चों को मांस और हड्डियां बिखरी मिलती थीं, जिससे उनका डर और बढ़ गया।
बच्चों से वसूले गए 100-100 रुपए
आरोप है कि इस ‘डर’ को खत्म करने के नाम पर हर छात्र से 100 रुपये लिए गए। स्कूल में 218 छात्र हैं, यानी करीब 21,800 रुपये जुटाए गए। वहीं मंदिर निर्माण पर 25 हजार रुपये खर्च होने की बात कही जा रही है।
डर इतना गहरा कि बच्चे बेहोश होने लगे
स्कूल से जुड़े लोगों के मुताबिक, बच्चों पर इसका गहरा मनोवैज्ञानिक असर पड़ा। कई छात्र-छात्राएं बेहोश होने लगे, चिल्लाने लगे और कुछ कथित तौर पर नेपाली भाषा में बोलने लगे।
स्थानीय लोगों ने इसे ‘भूत का असर’ मान लिया।
PTA का दावा—बलि प्रथा रोकने के लिए लिया फैसला
पीटीए अध्यक्ष चंदन सिंह भंडारी का कहना है कि मंदिर बनाने का फैसला अभिभावकों और शिक्षकों की सहमति से लिया गया।
उनके मुताबिक,
पिछले 30 साल में यहां 1000 से ज्यादा बलियां दी जा चुकी थीं
रात में पूजा-पाठ और अजीब गतिविधियां होती थीं
इससे स्कूल का माहौल खराब हो रहा था
इसी को रोकने के लिए मंदिर बनाकर ‘शांति पाठ’ कराने का फैसला लिया गया।
शिक्षकों का तर्क—काउंसलिंग भी कराई, असर नहीं
स्कूल के एक शिक्षक के अनुसार, बच्चों की कई बार काउंसलिंग कराई गई, लेकिन ‘भूत की कहानी’ का असर इतना गहरा है कि बच्चे बार-बार डर जाते हैं।
उनका कहना है कि मंदिर बनाने से कम से कम गंदगी और बलि जैसी गतिविधियों पर रोक लगेगी।
प्रधानाचार्य बोले—पढ़ाई का माहौल बनाना मकसद
प्रधानाचार्य ताजबर सिंह का कहना है कि वह हाल ही में स्कूल में आए हैं। बच्चों के बार-बार बेहोश होने की समस्या सामने आई, जिसके बाद पीटीए बैठक में मंदिर बनाने का सुझाव आया।
उनके मुताबिक,
“हमारा उद्देश्य स्कूल में शांति और पढ़ाई का माहौल बनाना है।
शिक्षा विभाग सख्त, जांच के आदेश
मुख्य शिक्षाधिकारी विनय कुमार ने साफ कहा कि स्कूल परिसर में अंधविश्वास को बढ़ावा देना गलत है। मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और खंड शिक्षा अधिकारी को जिम्मेदारी सौंपी गई है।
बड़ा सवाल: क्या ‘ज्ञान के मंदिर’ में अंधविश्वास की जगह?
कक्षा 6 से 12 तक पढ़ने वाले 218 बच्चों के इस स्कूल में अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या जहां वैज्ञानिक सोच सिखाई जानी चाहिए, वहां अंधविश्वास को जगह दी जा सकती है?
कौसानी का यह मामला सिर्फ एक स्कूल की कहानी नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है, जहां 21वीं सदी में भी ‘भूत’ विज्ञान पर भारी पड़ रहा है।
अब सबकी नजर जांच पर है—क्या सच्चाई सामने आएगी, या यह मामला भी सिस्टम में दबकर रह जाएगा?
गढ़वाली कुमाउनी वार्ता
समूह संपादक